हरिद्वार में गंगा बनी काल: अमरापुर घाट पर 13 साल के बच्चे की मौत, मई में ही डूबने के 15 केस,,,,,,,सवाल- जिम्मेदार कौन? प्रशासन, परिवार या हम सब
आखिर जिम्मेदार कौन है?
हरिद्वार की गंगा केवल आस्था नहीं, जीवन का प्रतीक है। लेकिन हर साल यही गंगा कई परिवारों की खुशियां भी अपने साथ बहा ले जाती है। अमरापुर घाट पर 13 साल के मासूम की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि कई सवालों को जन्म देती है।
चार दिन पहले दोस्तों के साथ नहाने गया बच्चा गंगा की तेज धारा में समा गया। आज जब उसका शव मिला तो पिता की चीखें घाट पर गूंज रही थीं। एक परिवार का भविष्य खत्म हो गया। लेकिन सवाल अब भी वही है — आखिर जिम्मेदार कौन?
1- क्या जिम्मेदार वो बच्चा है, जिसने नासमझी में गहरे पानी में जाने की गलती की?
2- क्या जिम्मेदार वो माता-पिता हैं, जिनकी निगरानी उस समय बच्चे पर नहीं थी?
3- क्या जिम्मेदार प्रशासन है, जिसे हर गर्मी में घाटों पर बढ़ती भीड़ और हादसों का अंदेशा पहले से रहता है, फिर भी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नजर नहीं आते?
3- या फिर जिम्मेदार हम सब हैं — जो घाटों पर बच्चों को खतरनाक स्टंट करते देखते हैं लेकिन उन्हें रोकते नहीं?
सच यही है कि ऐसे हादसों में एक नहीं, कई स्तरों पर लापरवाही होती है। गंगा किनारे चेतावनी बोर्ड लगे हैं, लेकिन लोग उन्हें नजरअंदाज करते हैं। पुलिस और जल पुलिस की तैनाती होती है, लेकिन हर घाट पर हर समय निगरानी संभव नहीं हो पाती। वहीं परिवार भी अक्सर बच्चों को अकेले घाटों तक जाने से नहीं रोकते।
2026 में हरिद्वार और ऋषिकेश क्षेत्र में डूबने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। मई 2026 में ही हरिद्वार-ऋषिकेश में डूबने के 15 मामले सामने आए।
हाल के कुछ प्रमुख मामले:
1- सप्तऋषि क्षेत्र में 19 वर्षीय युवक की गंगा में डूबकर मौत।
2- गाजियाबाद से आए दो दोस्तों की हरिद्वार में नहाते समय डूबने से मौत।
3- ऋषिकेश और हरिद्वार में अलग-अलग हादसों में 4 लोगों की मौत।
4- नए साल पर श्रीराम घाट में युवती गंगा की तेज धारा में बह गई।
इन आंकड़ों से साफ है कि हरिद्वार में डूबने की घटनाएं अब सामान्य खबर बनती जा रही हैं। गर्मी बढ़ते ही घाटों पर हजारों लोग पहुंचते हैं, लेकिन सुरक्षा नियमों का पालन बेहद कम होता है।
क्या होना चाहिए?
1- खतरनाक घाटों पर स्थायी बैरिकेडिंग
2- हर प्रमुख घाट पर लाइफगार्ड और गोताखोर
3- बच्चों के अकेले स्नान पर सख्ती
4- स्कूलों में जल सुरक्षा जागरूकता अभियान
4- घाटों पर CCTV और लगातार अनाउंसमेंट
5- अभिभावकों की जिम्मेदारी तय करना
क्योंकि गंगा में डूबने वाला सिर्फ एक इंसान नहीं होता… उसके साथ एक परिवार की उम्मीदें भी डूब जाती हैं।






















































































































































































































































































































