April 17, 2026
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अखाड़ा परिषद पर मातृ सदन का बड़ा हमला — “शंकराचार्य परंपरा का अपमान बर्दाश्त नहीं”

जूना अखाड़ा पठाधीश्वर अवधेशानंद गिरी, रविंद्र पुरी और कैलाशानंद पर गंभीर आरोप — धर्म को राजनीति के अधीन करने की कोशिश : स्वामी शिवानंद

 

धर्मनगरी हरिद्वार में संत समाज के भीतर एक बड़ा वैचारिक टकराव खुलकर सामने आया है। कनखल स्थित गंगा तट पर मातृ सदन में आयोजित प्रेस वार्ता में मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती ने अखाड़ा परिषद और कुछ प्रमुख अखाड़ों की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोलते हुए कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

स्वामी शिवानंद सरस्वती ने कहा कि हाल ही में जूना अखाड़े के पीठाधीश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी से जब मीडिया ने शंकराचार्य  परंपरा से जुड़े एक विवादित मामले पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कथित तौर पर यह कह दिया कि “हमें इससे कोई मतलब नहीं।” इस बयान को लेकर स्वामी शिवानंद सरस्वती ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिस अखाड़े की स्थापना आदि शंकराचार्य की परंपरा से हुई, उसी अखाड़े के पीठाधीश्वर यदि शंकराचार्य से ही असंबद्धता जताने लगें तो यह सनातन परंपरा के लिए अत्यंत गंभीर विषय है।

 

मातृ सदन के संस्थापक ने आरोप लगाया कि आज कुछ लोग संत परंपरा के मूल उद्देश्य से भटककर वैभव और प्रभाव की राजनीति में उलझ गए हैं। उन्होंने कहा कि साधु-संतों का धर्म समाज का मार्गदर्शन और धर्म की रक्षा करना है, लेकिन आज करोड़ों रुपये की भागवत कथाओं, सुख-सुविधाओं और सत्ता के निकट रहने की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है।

 

स्वामी शिवानंद सरस्वती ने बताया कि अवधेशानंद गिरी को लेकर पूर्व में भी मातृ सदन की ओर से एक पत्र भेजा गया था। इसके बाद अवधेशानंद गिरी ने स्वयं फोन पर संपर्क कर उनसे मिलने की इच्छा जताई थी और मामला शांत कराया गया था। लेकिन अब जिस प्रकार से शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के संदर्भ में कथित टिप्पणियां सामने आई हैं, उसे मातृ सदन शंकराचार्य परंपरा का अपमान मानता है और इसे किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

 

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या साधु-संतों की भूमिका अब केवल बड़े राजनीतिक नेताओं को फूल-माला पहनाने और सत्ता के कार्यक्रमों में शामिल होने तक सीमित रह गई है? उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्म किसी राजनीतिक दल, सत्ता या व्यक्ति विशेष के प्रभाव से संचालित नहीं होता।

 

प्रेस वार्ता में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि हरिद्वार के कई प्रमुख मंदिरों पर कथित रूप से गलत तरीके से कब्जे और प्रभाव की स्थिति बनी हुई है। मनसा देवी मंदिर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास भी इस संबंध में शिकायतें आई हैं और यदि धर्म का संचालन केवल राजनीतिक संरक्षण के आधार पर होगा तो यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती।

 

स्वामी शिवानंद सरस्वती ने आरोप लगाया कि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी, निरंजनी अखाड़े के कैलाशानंद और जूना पीठ के अवधेशानंद गिरी धर्म को अपने तरीके से संचालित करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद में भी बहुत कुछ सार्वजनिक हो चुका है और अब समाज स्वयं देख रहा है कि कौन धर्म के पक्ष में है और कौन अधर्म के साथ खड़ा है।

इस दौरान  शिवानंद सरस्वती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के संदर्भ में भी सवाल उठाते हुए कहा कि धर्म का अपना स्वतंत्र और सर्वोच्च स्थान है और उसे किसी सत्ता के प्रभाव में नहीं चलाया जा सकता।

 

उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास अवधेशानंद गिरी से जुड़ा एक पत्र मौजूद है, जिसे सार्वजनिक किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने कहा कि पूर्व में दिए गए वचन के कारण वह अभी तक उसे सार्वजनिक नहीं कर रहे थे, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वह इस पर विचार कर रहे हैं।

 

स्वामी शिवानंद सरस्वती ने आरोप लगाया कि आज अखाड़ों के भीतर गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच चुकी है और कुछ ऐसे लोग भी प्रभावशाली पदों पर पहुंच गए हैं जिन्हें न तो वेदों का पर्याप्त ज्ञान है और न ही सनातन परंपरा की मर्यादा का बोध।

 

कुंभ आयोजन को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकार द्वारा अखाड़ों को सीधे आर्थिक सहायता दी जाती है तो मातृ सदन इसका खुलकर विरोध करेगा। उन्होंने कहा कि यह कुंभ नहीं बल्कि अर्धकुंभ है और अर्धकुंभ की शास्त्रीय वैधता को लेकर भी समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं।

इसी दौरान मातृ सदन से जुड़े ब्रह्मचारी सुधानंद अधिवक्ता ने भी व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताई। उनका कहना था कि वर्तमान परिस्थितियों में हालात काफी बिगड़ चुके हैं और भ्रष्टाचार चरम पर दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि केवल अखाड़ा परिषद ही नहीं बल्कि कई संस्थाएं गंभीर सवालों के घेरे में खड़ी नजर आती हैं। इसके बावजूद सनातन धर्म के चारों शंकराचार्यों का जीवन, उनकी बुद्धिमत्ता और चरित्र इस बात का प्रमाण है कि धर्म का वास्तविक पतन नहीं हुआ है। उनके अनुसार कुछ अधर्मी तत्वों ने ही धर्म को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है, जबकि सनातन परंपरा में चारों शंकराचार्य आज भी समाज के मार्गदर्शक और पूजनीय हैं।

 

अंत में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने कहा कि धर्म सत्ता से बड़ा होता है और अंततः धर्म की व्यवस्था ही न्याय करेगी। उन्होंने कहा कि समाज सब देख रहा है और समय आने पर अधर्म के साथ खड़े किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

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