March 17, 2026
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संरक्षक ही बना भक्षक! जूना अखाड़ा का किया सत्यानाश — स्वामी प्रबोधानंद गिरि

हरि गिरि पर“सूअर के व्यापार के आरोप, जल्द सबूत लाऊंगा” — अखाड़े की मर्यादा निभाने की नसीहत

हरिद्वार। धर्म नगरी हरिद्वार में संत समाज के भीतर चल रहा विवाद अब तीखे टकराव में बदलता जा रहा है। महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरि ने वीडियो जारी कर जूना अखाड़ा संरक्षक पर गंभीर आरोप हैं। उन्होंने कहा कि हरि गिरि महाराज द्वारा संरक्षक पद पर रहते हुए भी उन्होंने अखाड़े की परंपराओं और गरिमा को नुकसान पहुंचाया है।

वीडियो संदेश में प्रबोधानंद गिरि ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “हरिगिरि महाराज ने जूना अखाड़े का सत्यानाश कर दिया।” उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान समय में फर्जी शंकराचार्यों की संख्या बढ़ रही है और अखाड़ा व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है। उनके अनुसार, जिन लोगों को पहले अस्वीकार किया गया था, उन्हें प्रभाव और धनबल के आधार पर उच्च धार्मिक उपाधियां दी जा रही हैं।

उन्होंने दो टूक कहा कि अखाड़ों का मूल उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा और परंपराओं का संरक्षण है, न कि मानद उपाधियों के माध्यम से विवाद खड़ा करना। ‘मानद शंकराचार्य’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि अखाड़ा कोई विश्वविद्यालय नहीं है, जो इस प्रकार की उपाधियां प्रदान करे।

प्रबोधानंद गिरि ने संत समाज के एक वर्ग पर राजनीति से नजदीकी बढ़ाने का आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ संत धर्म-कर्म से दूर होकर सत्ता और प्रभाव के इर्द-गिर्द सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नेताओं को स्नान कराना और उनकी चापलूसी करना कुछ संतों की प्रवृत्ति बन गई है, जबकि इसका विरोध करने वालों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और उनका बहिष्कार तक किया जाता है।

 

इसी दौरान उन्होंने हरिगिरि महाराज पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें सूअर के व्यापार से जुड़े होने की सूचनाएं मिली हैं और वे जल्द ही इस संबंध में साक्ष्य मीडिया के सामने प्रस्तुत करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि अखाड़े में रहते हुए उसकी मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है, अन्यथा व्यक्ति को अपने निजी व्यापार तक सीमित रहना चाहिए।

इसी बीच संत ने भी हरिगिरि महाराज को नसीहत देते हुए कहा कि आश्रमों से जुड़े विवादों और कब्जे जैसे आरोपों से संत समाज की छवि धूमिल होती है, इसलिए ऐसे कार्यों से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि अखाड़े की अपनी मर्यादा होती है और उसका पालन सभी संतों को करना चाहिए।

तंज भरे लहजे में कहा कि यदि कोई व्यक्ति व्यापारिक गतिविधियों में अधिक रुचि रखता है, तो उसे उसी कार्य में संलग्न रहना चाहिए, जबकि अखाड़े में रहते हुए धर्म और परंपराओं के अनुरूप आचरण अपेक्षित है।

पूरे प्रकरण ने संत समाज में हलचल तेज कर दी है और अखाड़ों की कार्यप्रणाली, अनुशासन और परंपराओं को लेकर बहस और गहरी हो गई है।

 

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