मातृ सदन का बिना ईंधन के तपता साधक, भूख की अग्नि में तपता सत्य।
लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका है, उसे निष्पक्ष होना चाहिए : स्वामी शिवानंद सरस्वती
मातृ सदन अनशन- न्यायिक मर्यादा पर सवाल, संतों का शांत लेकिन तपता प्रतिरोध
देवभूमि हरिद्वार स्थित मातृ सदन आश्रम में जारी अनशन आज 28वें दिन में प्रवेश कर चुका है। यह केवल एक विरोध नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और व्यवस्था के प्रति उठी एक मौन किंतु गूंजती हुई चेतावनी है। आश्रम के ब्रह्मचारी अत्बोधानंद पिछले 28 दिनों से अन्न-जल त्यागकर अनशन पर बैठे हैं। उनकी प्रमुख मांग है — लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका में निष्पक्षता और संबंधित प्रकरण में उचित कार्रवाई।

यह अनशन किसी मंचीय प्रदर्शन का हिस्सा नहीं, बल्कि गंगा तट की सादगी और संकल्प के बीच चल रहा है, जहां हर बीतता दिन शरीर को क्षीण करता है, लेकिन आत्मबल को और अधिक प्रखर बनाता जाता है। कमजोर होती देह, सूखते होंठ और स्थिर चेहरा उस तप की अनुभूति कराते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।
मातृ सदन बीते लगभग तीन दशकों से गंगा और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई का एक प्रमुख केंद्र रहा है। संस्था के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती, जो पूर्व में अध्यापक रहे हैं, ने समाज को स्पष्ट संदेश दिया —“गंगा सुरक्षित तो पर्यावरण सुरक्षित, और पर्यावरण सुरक्षित तो भविष्य सुरक्षित।”
इस संघर्ष में आश्रम से जुड़े कई साधकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है। संस्था से जुड़े लोग उच्च शिक्षित हैं और न्यायालयों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।

स्वामी शिवानंद सरस्वती ने आरोप लगाया है कि जिला जज नरेंद्र दत्त द्वारा मातृ सदन के संबंध में की गई टिप्पणी न्यायिक गरिमा के विपरीत है और इससे संस्था की छवि को ठेस पहुंची है। उनका कहना है कि हरिद्वार न्यायपालिका में दुरुस्तीकरण की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि जहां आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई को ही फरियादी का अपराध मान लिया जाए, वहां की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। साथ ही उन्होंने भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत को दोहराते हुए कहा —
“भले ही दोषी छूट जाए, लेकिन कोई निर्दोष दंडित न हो।”
वहीं, ब्रह्मचारी सुधानंद, जो अधिवक्ता भी हैं, ने बताया कि जिला जज नरेंद्र दत्त के विरुद्ध उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा चुकी है। इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को नियमित पीठ में निर्धारित है। उनका कहना है कि इस पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच और न्यायिक संतुलन अत्यंत आवश्यक है।
आत्मरक्षा का अधिकार या अपराध?
इस पूरे मामले की जड़ लगभग तीन वर्ष पूर्व की उस घटना से जुड़ी बताई जा रही है, जिसमें हरिद्वार के पंजा खेड़ी क्षेत्र में कथित रूप से हरे-भरे पेड़ों की कटाई और कॉलोनी विकास को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।
शिकायत के आधार पर प्रशासनिक स्तर पर जांच की प्रक्रिया चल रही थी। इसी दौरान प्रशासन द्वारा मौके पर बुलाए गए फरियादी एक पक्ष पर दूसरे पक्ष द्वारा हमला किए जाने का आरोप है।
बताया जाता है कि आत्मरक्षा की स्थिति में लाइसेंसी हथियार से फायरिंग हुई, जिसमें दो लोग घायल हुए। इसके बाद संबंधित व्यक्ति द्वारा हथियार सहित पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया गया। पुलिस ने दोनों पक्षों पर मुकदमा दर्ज किया।
मातृ सदन से जुड़े लोगों का आरोप है कि यह घटना आत्मरक्षा के दायरे में थी, लेकिन कार्रवाई के दौरान पीड़ित फरियादी पक्ष को ही कठोर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।
मातृ सदन का कहना है कि भारतीय कानून आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देता है और ऐसी परिस्थितियों में न्यायिक विवेक के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण के दौरान जमानत सुनवाई के समय जिला जज द्वारा मातृ सदन पर की गई टिप्पणी को ही अब विवाद का मुख्य कारण बताया जा रहा है।

ब्रह्मचारी सुधानंद के अनुसार, इसी आधार पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है, जिसमें निष्पक्ष जांच और न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और आत्मरक्षा के अधिकार जैसे गंभीर विषयों से भी जुड़ा हुआ है।
संघर्ष जारी, समर्थन बढ़ा
फिलहाल यह संघर्ष लगातार जारी है और विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संगठनों का समर्थन भी मातृ सदन को मिल रहा है। संतों का कहना है कि सत्य, तप और अहिंसा की शक्ति अंततः न्याय की दिशा तय करेगी।










































































































































































































































































































