हाईकोर्ट आदेश के बाद भी हरिद्वार की कुर्सी क्यों? — जिला जज नरेंद्र दत्त पर मातृ सदन के सवाल तेज,,,,सेवा अभिलेख में टिप्पणी दर्ज करने के आदेश का हवाला; तैनाती, जमानत विवाद और न्यायिक जवाबदेही पर उठे प्रश्न,,,,
हरिद्वार। हरिद्वार के मौजूदा जिला जज नरेंद्र दत्त को लेकर विवाद अब अधिक तीखा होता जा रहा है। मातृ सदन ने उनकी तैनाती और न्यायिक आचरण पर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश का हवाला दिया है, जिसमें संबंधित अधिकारी के कार्यव्यवहार पर टिप्पणी करते हुए आदेश की प्रति सेवा अभिलेख में दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
मातृ सदन द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में संस्था के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती ने कहा कि जब उच्च न्यायालय स्वयं किसी अधिकारी के निर्णय लेने के तरीके पर टिप्पणी कर चुका हो और आदेश को सेवा रिकॉर्ड में रखने के निर्देश दिए गए हों, तो ऐसे अधिकारी की संवेदनशील धार्मिक जनपद हरिद्वार में तैनाती शासन की निर्णय प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

उन्होंने कहा कि न्यायालय के आदेश में यह भी दर्ज है कि अपील दाखिल करने के प्रस्ताव को जिस तरह निपटाया गया, उस पर असंतोष व्यक्त करते हुए संबंधित अधिकारी को भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी दी गई थी। स्वामी के अनुसार ऐसे आदेश न्यायिक जवाबदेही से जुड़े गंभीर संकेत देते हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
स्वामी शिवानंद ने उषा टाउनशिप प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि अवैध कटान, अनियमित प्लॉटिंग और प्रशासनिक अनियमितताओं की शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता पर ही हमला हुआ। विवाद के दौरान आत्मरक्षा में गोली चलने के बाद शिकायतकर्ता ने आत्मसमर्पण किया, परंतु उसे ही जेल जाना पड़ा। मामले में कई लोगों पर मुकदमे दर्ज हुए और मातृ सदन से जुड़े ब्रह्मचारी अधिवक्ता सुधानंद को भी आरोपी बनाया गया।
संस्था का आरोप है कि जमानत सुनवाई के दौरान जिला जज द्वारा ब्रह्मचारी सुधानंद की वेशभूषा और संस्था पर टिप्पणी की गई जिसके बाद विवाद और गहरा गया। इसके बाद मातृ सदन ने जिला जज को पत्र भेजकर स्पष्टीकरण मांगा, परंतु जवाब न मिलने पर प्रेस वार्ता कर आमरण अनशन की चेतावनी जारी कर दी।

प्रेस वार्ता में ब्रह्मचारी प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में जनपद के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई के मामले सामने आए हैं, जिससे जनता में प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सवाल बने हुए हैं। उनका कहना है कि अब न्यायपालिका के आचरण पर भी चर्चा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है।
स्वामी शिवानंद ने कहा कि लोकतंत्र के चारों स्तंभों को आत्मनिरीक्षण करना होगा और न्यायपालिका को भी आत्ममंथन की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। मातृ सदन ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि न्यायिक गरिमा और व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए है।
फिलहाल हरिद्वार में यह मामला न्यायिक नियुक्तियों, संस्थागत विश्वसनीयता और जनविश्वास से जुड़ा बड़ा विमर्श बन चुका है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि शासन और न्यायिक तंत्र इस विवाद पर क्या रुख अपनाते हैं।



























































































































































































































































































