February 8, 2026
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नाथूराम गोडसे: आतंकवादी या क्रांतिकारी?

आजाद भारत में पहला “राजनीतिक बलिदान” नाथूराम गोडसे की फांसी पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल ।

नई दिल्ली/हरिद्वार।
भारत के बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श में नाथूराम विनायक गोडसे को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। जन मंचों और वैचारिक सभाओं में उभरता एक सशक्त मत यह मानता है कि गोडसे को केवल एक हत्यारे के रूप में देखना इतिहास का सरलीकरण है। इस वर्ग का तर्क है कि गोडसे एक संगठित आतंकवादी नहीं, बल्कि उस वैचारिक असंतोष का प्रतिनिधि था, जो उस समय के राजनीतिक निर्णयों से उपजा था।


घटना नहीं, पृष्ठभूमि समझने की मांग

30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद गोडसे को तत्काल गिरफ्तार किया गया। उसने न तो भागने का प्रयास किया, न ही अपने कृत्य से इनकार किया। अदालत में दिए गए अपने बयान में गोडसे ने स्पष्ट कहा कि उसका संघर्ष व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस नीति और दिशा से था, जिसे वह राष्ट्र के लिए घातक मानता था।

गोडसे समर्थकों के अनुसार, यह व्यवहार किसी छिपे हुए अपराधी का नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का था जो अपने कृत्य की नैतिक ज़िम्मेदारी लेने को तैयार था


फांसी का चुनाव: डर नहीं, वैचारिक दृढ़ता?

जब न्यायालय ने मृत्युदंड सुनाया, तब गोडसे के पास दया याचिका का विकल्प था। लेकिन उसने स्वेच्छा से फांसी स्वीकार की। समर्थक वर्ग इसे डर या अपराधबोध नहीं, बल्कि विचारधारा के प्रति अडिग रहने का उदाहरण मानता है।

उनका तर्क है कि—

  • गोडसे चाहता तो क्षमा याचना कर सकता था
  • लेकिन उसने मृत्यु को चुना, ताकि उसका विचार जीवित रहे

यहां एक ऐतिहासिक तुलना भी की जा रही है—
भगत सिंह को गुलाम भारत में फांसी दी गई, और
नाथूराम गोडसे को आजाद भारत में

समर्थकों का सवाल है:
क्या सत्ता बदलने के बाद भी विचारधारात्मक असहमति की सज़ा वही रही?


क्रांतिकारी बनाम आतंकवादी: परिभाषा पर विवाद

गोडसे को आतंकवादी कहे जाने पर उसके पक्षधर आपत्ति जताते हैं। उनका कहना है कि—

  • आतंकवाद का अर्थ है भय फैलाने के लिए अंधाधुंध हिंसा
  • गोडसे का कृत्य एक लक्षित राजनीतिक विरोध था, न कि जन-आतंक

वे तर्क देते हैं कि इतिहास में कई ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें अपने समय में अपराधी कहा गया, लेकिन बाद में उनके कार्यों को वैचारिक प्रतिरोध के रूप में समझा गया।


राजनीति, सत्ता और इतिहास

गोडसे समर्थक यह भी आरोप लगाते हैं कि तत्कालीन सत्ता ने राष्ट्र निर्माण के शुरुआती दौर में एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को हमेशा के लिए दबाने का निर्णय लिया। उनका मानना है कि गोडसे की फांसी केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं थी, बल्कि एक विचारधारा का दमन था।


निष्कर्ष नहीं, पुनर्विचार

यह बहस आज भी जारी है कि नाथूराम गोडसे अपराधी था या वैचारिक प्रतिरोध का प्रतीक।
समर्थक वर्ग के लिए वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने विचारों के लिए प्राणों की आहुति दी,
भले ही उसका मार्ग विवादास्पद रहा हो।

इतिहास शायद अंतिम फैसला न दे,
लेकिन यह प्रश्न छोड़ जाता है—
क्या हर असहज विचार को केवल अपराध की श्रेणी में रख देना ही न्याय है?

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