मातृ सदन भूख हड़ताल को लेकर बोले स्वामी प्रबोधानंद गिरि :हिंदुओं की ही नहीं रही हिंदुओं की बनाई सरकार।
हरिद्वार की होली के रंग पड़े हल्के — मातृ सदन ब्रह्मचारी आत्मबोधनन्द 12वें दिन भी हरिद्वार जिला जज नरेंद्र दत्त के खिलाफ भूख हड़ताल जारी।
हरिद्वार: रंग, उल्लास और समरसता का प्रतीक होली पर्व इस वर्ष धर्मनगरी हरिद्वार में एक अलग ही पृष्ठभूमि के बीच मनाया जा रहा है। जहां एक ओर शहर में अबीर-गुलाल की रौनक है, वहीं समाज हित मगं गा तट स्थित मातृ सदन में ब्रह्मचारी आत्मबोधनन्द पिछले 12 दिनों से आमरण अनशन पर अविचल बैठे हैं। उनका यह सत्याग्रह न्यायपालिका के खिलाफ उठाए गए गंभीर सवालों और वर्तमान जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरिद्वार नरेंद्र दत्त के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को लेकर जारी है।

मातृ सदन की ओर से अधिवक्ता ब्रह्मचारी सुधानंद ने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता, न्यायिक शुचिता और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग को लेकर है। उनके अनुसार यह प्रतिरोध लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तथा न्याय प्रणाली में निष्पक्षता बनाए रखने का प्रयास है।

इसी क्रम में धर्म संसद के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरि ने अनशन को समर्थन देते हुए कहा कि “हिंदुओं की बनाई हुई सरकार अब हिंदुओं के साथ ही नहीं खड़ी दिखाई दे रही है।” उन्होंने अनशनरत ब्रह्मचारी को अपना आशीर्वाद देते हुए कहा कि जब एक साधु समाज हित में भूखे पेट तप कर रहा हो, तब होली के रंग स्वाभाविक रूप से फीके पड़ जाते हैं। उन्होंने मातृ सदन के संस्थापक की परंपरा और आश्रम की गरिमा का उल्लेख करते हुए संस्था को पूर्ण समर्थन दिया तथा शासन-प्रशासन से शीघ्र संवाद स्थापित कर समाधान निकालने की अपील की।

मातृ सदन का कहना है कि यह आमरण अनशन न्याय, उत्तरदायित्व और व्यवस्था सुधार की गुहार है। होली जैसे सांस्कृतिक पर्व के बीच उठी यह आवाज अब व्यापक चर्चा का विषय बन गई है। प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था इस तप और प्रतिरोध को केवल एक विरोध के रूप में देखेगी, या फिर इसे आत्ममंथन का अवसर मानकर ठोस पहल करेगी।
संस्था से जुड़े संतों का कहना है कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और मौजूदा प्रशासनिक तंत्र को आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्या एक साधु के आमरण अनशन पर बैठने के बाद ही व्यवस्था जागेगी? यह सवाल आज जनचर्चा का विषय बना हुआ है। सामाजिक स्तर पर भी नागरिकों को यह विचार करना होगा कि न्याय, पारदर्शिता और नैतिकता की मांग केवल आश्रमों तक सीमित रहे या फिर जनसहभागिता के साथ व्यापक बदलाव का आधार बने।
































































































































































































































































































