हरिद्वार में न्यायिक मर्यादा पर सवाल — मातृ सदन का सत्याग्रह नौवें दिन, स्वास्थ्य संकट गहराया
ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का गिरता स्वास्थ्य बना शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती, लगातार निगरानी में स्वास्थ्य विभाग
हरिद्वार स्थित आध्यात्मिक-पर्यावरणीय संस्था मातृ सदन ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरिद्वार नरेंद्र दत्त के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाते हुए देश के शीर्ष न्यायिक पदाधिकारी को औपचारिक शिकायत भेजी है। संस्था का आरोप है कि न्यायिक आदेशों में की गई टिप्पणियाँ न्यायिक मर्यादा के विरुद्ध हैं और इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्न उठ रहे हैं।
संस्था के ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने अपने प्रार्थना-पत्र में माननीय मुख्य न्यायाधीश, नरेंद्र दत्त से संबंधित न्यायाधीश के तत्काल निलंबन, विभागीय कार्रवाई और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। शिकायत में कहा गया है कि एक जमानत प्रकरण, जो मातृ सदन से असंबंधित था, उसमें आदेश के भीतर संस्था पर गंभीर आरोप दर्ज किए गए, जिससे संस्था की छवि प्रभावित हुई।

अधिवक्ता ब्रह्मचारी सुधानंद का कहना है कि आदेश में की गई टिप्पणियाँ तथ्यहीन, असंगत और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं। इस प्रकार की टिप्पणियाँ न्यायिक संयम के सिद्धांतों के विपरीत हैं और इससे न्यायिक प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। प्रार्थना-पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित अधिकारी के आचरण पर पूर्व में भी न्यायिक टिप्पणियाँ हो चुकी हैं, जिनमें नरेंद्र दत्त के आदेशों का संदर्भ भी शामिल है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का स्वास्थ्य प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन गया है। जानकारी के अनुसार वे 21 फरवरी से निरंतर अनशन पर हैं और उनका वजन अब तक लगभग 3 किलोग्राम तक घट चुका है। वे केवल एक गिलास नींबू पानी के सहारे उपवास जारी रखे हुए हैं। हरिद्वार का स्वास्थ्य विभाग लगातार उनकी स्थिति की निगरानी कर रहा है और कल भी चिकित्सकीय टीम ने आश्रम पहुंचकर उनका परीक्षण किया।

मातृ सदन का कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू नहीं होती, सत्याग्रह जारी रहेगा।
यह मामला अब न्यायिक प्रणाली की पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत अनुशासन से जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है, जिस पर सामाजिक और विधिक हलकों की नजरें टिक गई हैं।
मातृ सदन को लंबे समय से देख रहे सामाजिक पर्यवेक्षकों और स्थानीय जनमानस का कहना है कि मातृ सदन का संघर्ष तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे तप, त्याग और जनहित के मुद्दों से जुड़ा रहा है। उनका कहना है कि पूर्व में भी आश्रम से जुड़े कई ब्रह्मचारियों ने पर्यावरण, गंगा संरक्षण और सत्याग्रह के प्रश्नों पर अपने प्राणों तक का बलिदान दिया है। इन साधकों की पहचान केवल धार्मिक अनुशासन तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे उच्च शिक्षित, सामाजिक चेतना से जुड़े और नैतिक सार्वजनिक जीवन के उदाहरण के रूप में भी देखे जाते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान सत्याग्रह को भी लोग एक निरंतर मूल्याधारित परंपरा का विस्तार मान रहे हैं।































































































































































































































































































