“मातृसदन अपने सत्य बिंदु पर खड़ा है, ब्रह्म को भी सत्य बिंदु पर ही आना होता है ” —संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती
गंगा रक्षा, न्याय और नैतिक शासन की मांग को लेकर महात्माओं का अनशन सातवें दिन

हरिद्वार गंगा किनारे स्थित मातृ सदन एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में आ गया है। आश्रम में चल रहा अनशन अब केवल एक संस्थागत विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था, पर्यावरण और न्याय—तीनों के संतुलन की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
आश्रम के संस्थापक ने कहा कि मातृसदन सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग खड़ा है। उनका कहना है कि सत्य के मार्ग पर चलने वालों को अंततः वही शक्ति सहारा देती है जिसे समाज धर्म कहता है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म स्वयं रक्षा करता है, और यही विश्वास आश्रम के संघर्ष का आधार है।

ब्रह्मचारी के अनुसार यह संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध है जिसमें सत्ता, प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर भ्रष्टाचार का प्रभाव बढ़ता दिखाई देता है। इसी क्रम में ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का अनशन सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है।

अधिवक्ता ब्रह्मचारी सुधानंद का कहना है कि जिला न्यायालय से जुड़े घटनाक्रमों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। विशेष रूप से जिला जज की भूमिका को लेकर संत समाज ने न्यायिक संवेदनशीलता और विवेक पर चिंता व्यक्त करते हुए जिला जज नरेंद्र दत्त को हटाने की बात कही । उनका कहना है कि भारत में न्यायपालिका को अंतिम आशा माना जाता है, इसलिए उसके निर्णयों में संतुलन और परिस्थिति का परीक्षण अपेक्षित होता है।
आत्मरक्षा, न्यायिक विवेक और उठते प्रश्न
इसी संदर्भ में आश्रम से जुड़े अनुयायी अतुल चौहान का मामला भी चर्चा में है, जो वर्तमान में जेल में हैं। आश्रम पक्ष का कहना है कि उन पर हमला हुआ, जिसके बाद उन्होंने आत्मरक्षा में लाइसेंसी हथियार का प्रयोग किया और तत्पश्चात स्वयं आत्मसमर्पण कर दिया।
स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होता है, तो न्यायिक विवेक का दायित्व होता है कि घटना की परिस्थितियों का परीक्षण कर निष्पक्ष दृष्टि से निर्णय लिया जाए। उनका प्रश्न है कि क्या ऐसे मामलों में जमानत पर विचार नहीं होना चाहिए, और क्या यह न्याय व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय नहीं बनता?
गंगा केवल नदी नहीं, राष्ट्र की श्वास है
मातृसदन का आंदोलन केवल न्यायिक प्रश्नों तक सीमित नहीं है। लगभग तीन दशकों से यह आश्रम अविरल और निर्मल , जैव विविधता की रक्षा और प्रकृति के संतुलन के लिए तप, त्याग और अनशन का मार्ग अपनाता आया है। इस संघर्ष में कई संतों के बलिदान भी जुड़े रहे हैं और आश्रम से जुड़े अनेक साधक उच्च शिक्षित तथा शोधपरक दृष्टि वाले बताए जाते हैं।
आश्रम का कहना है कि जब तक सहायक नदियाँ, जलस्रोत, तालाब, आर्द्रभूमियाँ और पारिस्थितिक तंत्र जीवित नहीं रहेंगे, तब तक गंगा का अस्तित्व केवल नक्शे तक सीमित रह जाएगा, जीवन में नहीं।
पर्यावरण और आध्यात्मिक समाज से खुली अपील
मातृसदन ने देशभर के पर्यावरणविदों, संतों, आध्यात्मिक संगठनों और नागरिक समाज से अपील की है कि वे इस संघर्ष को स्थानीय मुद्दा न समझें। यह आने वाली पीढ़ियों की सांस, जल और नैतिक विरासत का प्रश्न है।
मातृ सदन आश्रम का संदेश स्पष्ट है —
यदि प्रकृति बचेगी तो संस्कृति बचेगी,
और यदि सत्य बचेगा तो समाज बचेगा।






























































































































































































































































































