February 8, 2026
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Parle-G:फैक्ट्री बंद 1929 से विश्वसनीयता आज भी अडिग,,विरलेश्वर–पारलेश्वर की धरती से निकला भारत का भरोसा

दिल्ली | विशेष कवर रिपोर्ट

भारत में शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जहाँ कभी Parle-G बिस्किट न खाया गया हो। चाय में डुबोकर खाया जाने वाला यह बिस्किट सिर्फ एक खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों, भरोसे और रोज़मर्रा की सादगी से जुड़ा नाम बन चुका है।
इसी भरोसे से जुड़ी एक ऐतिहासिक खबर ने देशभर में भावुकता पैदा कर दी है।

मुंबई के विले पार्ले स्थित Parle-G की ऐतिहासिक फैक्ट्री अब बंद हो चुकी है। यही वह स्थान है जहाँ से भारत के सबसे लोकप्रिय बिस्किट ने अपनी पहचान बनाई थी। वर्ष 1929 में स्थापित यह फैक्ट्री अब एक नए व्यावसायिक प्रोजेक्ट में तब्दील की जा रही है।

1929 से शुरू हुआ था Parle-G का सफर

Parle Products की स्थापना 1929 में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पार्ले इलाके में की थी। शुरुआती दौर में यहाँ टॉफी और कैंडी का निर्माण होता था, लेकिन 1939 में कंपनी ने बिस्किट निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया।
यहीं से जन्म हुआ Parle-G का—जो धीरे-धीरे भारत के हर वर्ग, हर घर और हर पीढ़ी का हिस्सा बन गया।

Parle नाम और आध्यात्मिक जड़ें

“Parle” नाम केवल एक व्यावसायिक पहचान नहीं, बल्कि इस भूमि की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा माना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार यह नाम विले पार्ले क्षेत्र से आया है, जिसे Padle–Irle गांवों अथवा विरलेश्वर और पारलेश्वर महादेव मंदिरों से जोड़ा जाता है।
यानी Parle-G की जड़ें केवल उद्योग में नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और स्थानीय संस्कृति में भी रची-बसी हैं।

फैक्ट्री बंद, लेकिन भरोसा कायम — दो ठोस वजहें

पहली वजह:
Parle-G की गुणवत्ता, स्वाद और किफायती पोषण में कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी इसका उत्पादन देश के कई आधुनिक संयंत्रों में जारी है।

दूसरी वजह:
फैक्ट्री बंद होने का कारण उत्पादन में गिरावट नहीं, बल्कि शहरी भूमि मूल्य, आधुनिक औद्योगिक पुनर्गठन और व्यावसायिक रणनीति है।
ब्रांड की मांग और बाज़ार पकड़ पहले की तरह मजबूत बनी हुई है।

फैक्ट बॉक्स

स्थापना वर्ष: 1929
बिस्किट निर्माण शुरू: 1939
ऐतिहासिक स्थान: विले पार्ले, मुंबई
आध्यात्मिक संदर्भ: विरलेश्वर–पारलेश्वर मंदिर क्षेत्र
वर्तमान स्थिति: फैक्ट्री बंद, उत्पादन जारी

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