एक बार फिर मातृ सदन और शासन-प्रशासन आमने-सामने, हड़कंप
हरिद्वार: फरियादी द्वारा आत्मरक्षा में फायरिंग के बावजूद जेल
स्वामी शिवानंद सरस्वती के शिष्य ब्रह्मचारी सुधानंद पर भी मुकदमा दर्ज
हरिद्वार के कनखल थाना क्षेत्र के पंजनहेड़ी में हुआ बहुचर्चित गोलीकांड अब केवल एक आपराधिक घटना भर नहीं रह गया है। यह मामला उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण, अवैध प्लाटिंग, सत्ता-संरक्षण और न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सीधा सवाल बनकर उभर आया है। राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता अतुल चौहान पर हुए जानलेवा हमले के मामले में पुलिस ने भाजपा नेता एवं जिला पंचायत उपाध्यक्ष अमित चौहान सहित छह लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। यह कार्रवाई अतुल चौहान की पत्नी दीपशिखा द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर की गई।
तहरीर के अनुसार, क्षेत्र में बाग और कृषि भूमि को काटकर अवैध प्लाटिंग की जा रही थी, जिसकी शिकायत अतुल चौहान ने पहले ही प्रशासन से की थी। शिकायत के बाद प्रशासनिक टीम जांच के लिए मौके पर पहुंची थी और अतुल चौहान को भी बुलाया गया था।
आरोप है कि इसी दौरान अमित चौहान अपने साथियों के साथ मौके पर पहुंचे और वाहन से उतरते ही अतुल चौहान पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया गया। हालात बेकाबू होने पर आत्मरक्षा में लाइसेंसी शस्त्र से फायरिंग की स्थिति बनी।
ब्रह्मचारी सुधानंद पर मुकदमा, संत समाज में नाराज़गी
इस पूरे प्रकरण में मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती के शिष्य ब्रह्मचारी सुधानंद पर भी मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद संत समाज और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। संतों का कहना है कि जो लोग वर्षों से गंगा, वृक्षों और भूमि संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें ही अभियुक्त के रूप में खड़ा किया जाना व्यवस्था की मंशा पर सवाल खड़े करता है।
प्राथमिक वीडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल
घटना से जुड़े प्राथमिक वीडियो सामने आने के बाद पूरे घटनाक्रम पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पेट में गोली लगने के बावजूद सचिन पैरों पर चलता नजर आ रहा है, जबकि हाथ में गोली लगने वाला व्यक्ति स्ट्रेचर पर ले जाया जा रहा है। इन दृश्यों ने फायरिंग की परिस्थितियों और दावों को लेकर संदेह और बहस दोनों को जन्म दिया है।
असमंजस में शासन-प्रशासन
घटना के बाद शासन और प्रशासन की भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर अवैध प्लाटिंग और वृक्ष कटान के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर फायरिंग जैसी गंभीर घटना से कानून-व्यवस्था पर उठते प्रश्न। अब तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि प्रशासन इस पूरे मामले को पर्यावरण संरक्षण के संघर्ष के रूप में देख रहा है या केवल आपराधिक दृष्टि से।
क्रांति दल का तीखा सवाल
इस बीच, क्रांति दल से जुड़े लोगों ने इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि न्याय की मांग करने वालों को बार-बार हिंसा, हमले और मुकदमों का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गहरे संकट का संकेत है।
क्रांति दल का कहना है—
“अगर हालात ऐसे बन रहे हैं कि न्याय पाने के लिए लोगों को गोली चलाने की नौबत आ रही है, तो वर्षों तक कानूनी प्रक्रियाओं में उलझने का औचित्य क्या रह जाता है? जब हर दरवाज़ा बंद हो जाए, तो लोग सीधे न्याय के दर पर खटखटाने को मजबूर हो जाते हैं।”
हालांकि दल ने स्पष्ट किया कि वे हिंसा का समर्थन नहीं करते, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि न्याय की प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए कठिन, लंबी और असहज होती जा रही है, जिसका लाभ प्रभावशाली और माफिया तत्वों को मिल रहा है।
धरातल पर तैरते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या आज उत्तराखंड में वृक्षों और कृषि भूमि को बचाने की लड़ाई अपराध मानी जाने लगी है?
क्या आत्मरक्षा के लिए वैध रूप से प्राप्त शस्त्र का उपयोग संकट की घड़ी में अपराध की श्रेणी में आ जाएगा?
क्या कानून की लंबी प्रक्रिया आम नागरिक को न्याय से दूर कर रही है?
क्रॉस एफआईआर से टिका भरोसा, लेकिन बेचैनी बरकरार
हालांकि पुलिस द्वारा क्रॉस एफआईआर दर्ज किए जाने से लोगों का भरोसा आंशिक रूप से व्यवस्था पर टिका हुआ है, लेकिन जमीनी स्तर पर असंतोष और बेचैनी साफ महसूस की जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकारों की राय: अब ‘पुलिसिया सर्जरी’ की ज़रूरत
इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि हरिद्वार हाल ही में जिस प्रशासनिक सर्जरी के दौर से गुज़रा है, उसके बाद अब पुलिसिया सर्जरी की ज़रूरत साफ दिखाई दे रही है। उनका मानना है कि ज़मीन, अवैध प्लाटिंग और सत्ता से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका बार-बार सवालों के घेरे में आती रही है। यदि निष्पक्ष, साहसिक और संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो कानून-व्यवस्था पर जनता का भरोसा और कमजोर होगा।
पत्रकारों के अनुसार, यह मामला किसी एक घटना या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि प्रभावशाली वर्ग और आम नागरिक के लिए कानून के पैमाने अलग-अलग होते जा रहे हैं।
मातृ सदन की भूमिका और आगे की राह
इस बीच, मातृ सदन द्वारा कल दोपहर 12 बजे प्रेस वार्ता आयोजित की गई है। इसके बाद मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती आगामी रणनीति और कार्रवाई की घोषणा करेंगे।
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले को लेकर अनशन की चर्चा भी तेज हो गई है, जिससे प्रशासनिक हलकों में चिंता बढ़ गई है।
फिलहाल, कनखल गोलीकांड एक घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड में न्याय, पर्यावरण और सत्ता के बीच टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है।


















































































































































































































































































